Wednesday, October 21, 2020

तुम!

 

अगर मैं तुम्हें एक शहर मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारी विशालता के आगे?
मैं गलियां भूल जाऊंगा
लेकिन तुम्हारे मन की
टोह नहीं पाऊंगा

अगर मैं तुम्हें एक गांव मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारी सादगी के आगे?
नतमस्तक होकर मुझे
रहना पड़ेगा गांव में
बेघर सा होकर

अगर मै तुम्हें एक घर मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारी सुंदरता के आगे?
मैं आईना बन जाऊंगा
संवर जाना अच्छे से
बगैर देरी किए

अगर मैं तुम्हें आंगन मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारे आंचल के आगे?
मैं बारिश की बूंदों सा
तुम्हें भिगोऊंगा पर
लौट भी जाऊंगा



























































अजी सुनते हो सरकार !

  हम समझ रहें है, आप कब समझेंगे सियासत के शोर में हमारी नहीं सुनेंगे? हम किसान है अपना हक नहीं छोड़ेंगे कानून बदलवाना जिद है इसे नहीं छ...