Tuesday, September 22, 2020

मंजिलें गिरवी हैं!

 

मंजिलें गिरवी हैं, रास्ते तलबगार हैं
सपने देखो!, ये खुद इक व्यापार हैं!

कांटों से बच, बचाकर निकल आओ
तो हर दामन में फूलों की मयार हैं!

राह की ठोकरें, बिगाडेंगी हवा कैसे?
हमारी सांस से जब चलती बयार हैं!

जब कोशिशें, जुनू का राग छेड़ दें
ऐसे हालात में, हम भी तो तैयार हैं!

Tuesday, September 15, 2020

सूखा दरिया है मंज़र में !

 

रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये देती क्यूं हैं?
सबकुछ छीन के, जान हमारी लेती क्यूं हैं


रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये होती क्यूं हैं?
संग मेरे जगती, फिर बाद मेरे सोती क्यूं है!


रात अगर बेचैनी देती हैं,तो ये देती क्यूं है?
आइने में देखकर चेहरा,फिर ये रोती क्यूं है!


रात अगर बेचैनी देती हैं,तो ये टूटी क्यूं है?
बयां सच्चाई करती है,फिर ये झूठी क्यूं हैं!


रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये छोटी क्यूं हैं?
सूखा दरिया है मंज़र में,तो ये भिगोती क्यूं हैं!












तुम आओगी! मुझ पर मेहरबानी होगी

                       


दिल की बात ज़ुबां तक लानी होगी

दुखती तो रग फिर वही पुरानी होगी!


क्यों नजदीकियों ने बढ़ा दी है प्यास

फिर से इस दरिया में रवानी होगी?


तन्हा महकमों का हुनर लिए बैठे है

रिश्तों में कब जज़्बात बयानी होगी!


अदावत ने घेरा है पैरों को बेड़ियों से

अरे! ज़मानत क्या मुंहजबानी होगी


इस कैद से फिसले तो कहां जाएंगे?

बंद लिफाफे में तहरीर पुरानी होगी!


बैठेंगे कहीं पत्थरों के दरमियान हम!

बिसरी बातों की पूरी एक कहानी होगी!


दिल पे हाथ रखेंगे एक आस लगाएंगे!

तुम आओगी! मुझ पर मेहरबानी होगी

































Monday, September 14, 2020

खुद पेंशन के बूते खा रहें हैं!...

               


जुमलों की बनी है माला

हर तरह हो रही है गड़बड़

हर तरफ हो रहा घोटाला

जेब में एडिटर साहेब हैं

और मनमर्जी काहे न हो

जब खुद के दफ्तर से

अख़बार जा रहा है निकाला!


आलम तो देखिए जनाब...


सरकारों से सरकारी विभाग

अब नहीं जा रहा है संभाला!



तब...

देशभक्ति की भावना

सरकार जगाने आई है

युवाओं के भविष्य के 

सौदे का मसौदा लाई है.


कर्तव्य पथ पर कर्तव्य से 

मुंह मोड़ रही है सरकार

बेरोजगारों को किस दोराहे 

पर छोंड रही है सरकार.


देशभक्ति के संग दिया

नैतिकता बढ़ाने का हवाला

फिर चुपके से छीन लिया

मुंह को आ रहा निवाला!


खुद का दामन मैला हैं

ये दाग छुड़ाने आएं है

खुद पेंशन के बूते खा रहें हैं

अब नौकरी खाने आएं हैं.


वादों की झड़ी लगाने वाले

रोजी का व्यापार करेंगे!

नाव में करके बैठे हैं छेद

22 की वैतरणी क्या फिर से

राम भरोसे ही पार करेंगे!


लेकिन...

सरकार सुन लेे कान खोलकर

निजीकरण की दुकान खोलकर!


भाषणों का शिकार युवा भी तैयार है

सोशल साइट्स से लेकर हर मोर्चे पर

विरोध है और परिवर्तन की बयार है

अबकी बार रोड पर सीधा आर पार है.




































Friday, September 4, 2020

कोशिशें जारी हैं

 


सफ़र में रहते हैं, किसी के पीछे नहीं चलते

गिर भी जाएं तो रहनुमाई पर नहीं संभलते


घने अंधकार का साया नकाब ओढ़े हुए है

हौसले बड़े हों तो, जुगनुओं जैसे नहीं जलते


उम्मीदें हैं, इक आस भी जहन में कौंधती है

बादलों के इरादों से डरकर सूरज नहीं ढलते


हवाएं मंजिलों को छोड़कर रुख मोड़ लेती हैं

कोशिश जारी है, हम बैठकर हाथ नहीं मिलते


अजी सुनते हो सरकार !

  हम समझ रहें है, आप कब समझेंगे सियासत के शोर में हमारी नहीं सुनेंगे? हम किसान है अपना हक नहीं छोड़ेंगे कानून बदलवाना जिद है इसे नहीं छ...