Wednesday, December 16, 2020

अजी सुनते हो सरकार !

 


हम समझ रहें है, आप कब समझेंगे
सियासत के शोर में हमारी नहीं सुनेंगे?
हम किसान है अपना हक नहीं छोड़ेंगे
कानून बदलवाना जिद है इसे नहीं छोड़ेंगे

तुम्हारे हृदय! गर अब भी न पसींजेंगे
तो, देखना तुम!अबकी आंसू उपजेंगे

क्योंकि,
माथे पर चिंता की लकीरें लेकर
धूप में बदन को सुखाया भी हम सबके वास्ते
आज उस अन्नदाता के लिए
बंद हैं! संसद के रास्ते

उनके मुद्दे पर भी अभी तक
बातचीत से हल नहीं निकला
जिनके हल सुबह से निकलकर
शाम की बातचीत के वक़्त
खेत से वापस घर आते हैं





























Tuesday, December 15, 2020

आदमी भी आदमी बचता कहां है

 आज के दौर में आदमी भी आदमी बचता कहां है

चलता है कहीं और जाने को और पहुंचता कहां हैं?


सब अपने बनाए रास्तों पर हैं मंजिलों के मालिक 

ऐसे रास्ते पर हैं हम मिट जाए पर बदलता कहां हैं?


गलतफहमी की बेड़ियां तोड़के आ जाओ तुम भी

तुम झगड़ रहे हो जैसे ऐसे कोई झगड़ता कहां है?


सबकी मर्ज़ी अलग है कोई कहीं भी जाए जाने दो

यहां पर वैसे भी हर शख़्स मेरे साथ चलता कहां हैं?


आग लगाने वाले हजारों हाथ मिलेंगे इस ज़माने में

रूह जल जाती है जब तो फिर बदन जलता कहां है


ये वादा रहा.....

 


अजनबी चेहरे की तलाश में
जब तुम घर से निकलते हो
किनारे दरिया के पहुंचते ही
परछाई देखकर अपनी क्यों
पत्थर पानी में फेंकते हो?

वो चेहरा!
जो हवाओं में घुल चुका है
रेत की मानिंद फिसल चुका है
तुम्हें अहसास भी है
जब तुमने मुट्ठी खोली थी
वो तुम्हारे हाथ से निकलकर
हवाओं के साथ मिलकर
दूर बहुत दूर चला गया है!

ये तुम्हारी मर्ज़ी की तुम
इंतज़ार करो!
यकीन करो
कि वो चेहरा
यकीनन हूब हू
तुम्हारे इंतज़ार को पूरा करने
आएगा।

मैं नज़र रखूंगा तुम
गर तुम्हारा इंतज़ार पूरा हुआ
वो चेहरा लौट आया तो
मैं भी उसके लौटने का इंतजार करूंगा
दिन, महीने, साल, सदियों तक
ये वादा रहा.....























Wednesday, October 21, 2020

तुम!

 

अगर मैं तुम्हें एक शहर मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारी विशालता के आगे?
मैं गलियां भूल जाऊंगा
लेकिन तुम्हारे मन की
टोह नहीं पाऊंगा

अगर मैं तुम्हें एक गांव मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारी सादगी के आगे?
नतमस्तक होकर मुझे
रहना पड़ेगा गांव में
बेघर सा होकर

अगर मै तुम्हें एक घर मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारी सुंदरता के आगे?
मैं आईना बन जाऊंगा
संवर जाना अच्छे से
बगैर देरी किए

अगर मैं तुम्हें आंगन मान लूं
तो मेरा अस्तित्व क्या होगा
तुम्हारे आंचल के आगे?
मैं बारिश की बूंदों सा
तुम्हें भिगोऊंगा पर
लौट भी जाऊंगा



























































Tuesday, September 22, 2020

मंजिलें गिरवी हैं!

 

मंजिलें गिरवी हैं, रास्ते तलबगार हैं
सपने देखो!, ये खुद इक व्यापार हैं!

कांटों से बच, बचाकर निकल आओ
तो हर दामन में फूलों की मयार हैं!

राह की ठोकरें, बिगाडेंगी हवा कैसे?
हमारी सांस से जब चलती बयार हैं!

जब कोशिशें, जुनू का राग छेड़ दें
ऐसे हालात में, हम भी तो तैयार हैं!

Tuesday, September 15, 2020

सूखा दरिया है मंज़र में !

 

रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये देती क्यूं हैं?
सबकुछ छीन के, जान हमारी लेती क्यूं हैं


रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये होती क्यूं हैं?
संग मेरे जगती, फिर बाद मेरे सोती क्यूं है!


रात अगर बेचैनी देती हैं,तो ये देती क्यूं है?
आइने में देखकर चेहरा,फिर ये रोती क्यूं है!


रात अगर बेचैनी देती हैं,तो ये टूटी क्यूं है?
बयां सच्चाई करती है,फिर ये झूठी क्यूं हैं!


रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये छोटी क्यूं हैं?
सूखा दरिया है मंज़र में,तो ये भिगोती क्यूं हैं!












तुम आओगी! मुझ पर मेहरबानी होगी

                       


दिल की बात ज़ुबां तक लानी होगी

दुखती तो रग फिर वही पुरानी होगी!


क्यों नजदीकियों ने बढ़ा दी है प्यास

फिर से इस दरिया में रवानी होगी?


तन्हा महकमों का हुनर लिए बैठे है

रिश्तों में कब जज़्बात बयानी होगी!


अदावत ने घेरा है पैरों को बेड़ियों से

अरे! ज़मानत क्या मुंहजबानी होगी


इस कैद से फिसले तो कहां जाएंगे?

बंद लिफाफे में तहरीर पुरानी होगी!


बैठेंगे कहीं पत्थरों के दरमियान हम!

बिसरी बातों की पूरी एक कहानी होगी!


दिल पे हाथ रखेंगे एक आस लगाएंगे!

तुम आओगी! मुझ पर मेहरबानी होगी

































अजी सुनते हो सरकार !

  हम समझ रहें है, आप कब समझेंगे सियासत के शोर में हमारी नहीं सुनेंगे? हम किसान है अपना हक नहीं छोड़ेंगे कानून बदलवाना जिद है इसे नहीं छ...