अजनबी चेहरे की तलाश में
जब तुम घर से निकलते हो
किनारे दरिया के पहुंचते ही
परछाई देखकर अपनी क्यों
पत्थर पानी में फेंकते हो?
वो चेहरा!
जो हवाओं में घुल चुका है
रेत की मानिंद फिसल चुका है
तुम्हें अहसास भी है
जब तुमने मुट्ठी खोली थी
वो तुम्हारे हाथ से निकलकर
हवाओं के साथ मिलकर
दूर बहुत दूर चला गया है!
ये तुम्हारी मर्ज़ी की तुम
इंतज़ार करो!
यकीन करो
कि वो चेहरा
यकीनन हूब हू
तुम्हारे इंतज़ार को पूरा करने
आएगा।
मैं नज़र रखूंगा तुम
गर तुम्हारा इंतज़ार पूरा हुआ
वो चेहरा लौट आया तो
मैं भी उसके लौटने का इंतजार करूंगा
दिन, महीने, साल, सदियों तक
ये वादा रहा.....
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