रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये देती क्यूं हैं?
सबकुछ छीन के, जान हमारी लेती क्यूं हैं
रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये होती क्यूं हैं?
संग मेरे जगती, फिर बाद मेरे सोती क्यूं है!
रात अगर बेचैनी देती हैं,तो ये देती क्यूं है?
आइने में देखकर चेहरा,फिर ये रोती क्यूं है!
रात अगर बेचैनी देती हैं,तो ये टूटी क्यूं है?
बयां सच्चाई करती है,फिर ये झूठी क्यूं हैं!
रात अगर बेचैनी देती हैं, तो ये छोटी क्यूं हैं?
सूखा दरिया है मंज़र में,तो ये भिगोती क्यूं हैं!
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