दिल की बात ज़ुबां तक लानी होगी
दुखती तो रग फिर वही पुरानी होगी!
क्यों नजदीकियों ने बढ़ा दी है प्यास
फिर से इस दरिया में रवानी होगी?
तन्हा महकमों का हुनर लिए बैठे है
रिश्तों में कब जज़्बात बयानी होगी!
अदावत ने घेरा है पैरों को बेड़ियों से
अरे! ज़मानत क्या मुंहजबानी होगी
इस कैद से फिसले तो कहां जाएंगे?
बंद लिफाफे में तहरीर पुरानी होगी!
बैठेंगे कहीं पत्थरों के दरमियान हम!
बिसरी बातों की पूरी एक कहानी होगी!
दिल पे हाथ रखेंगे एक आस लगाएंगे!
तुम आओगी! मुझ पर मेहरबानी होगी
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