मंजिलें गिरवी हैं, रास्ते तलबगार हैं
सपने देखो!, ये खुद इक व्यापार हैं!
कांटों से बच, बचाकर निकल आओ
तो हर दामन में फूलों की मयार हैं!
राह की ठोकरें, बिगाडेंगी हवा कैसे?
हमारी सांस से जब चलती बयार हैं!
जब कोशिशें, जुनू का राग छेड़ दें
ऐसे हालात में, हम भी तो तैयार हैं!
No comments:
Post a Comment