Tuesday, August 25, 2020

अज़ीब शख्सियत थी तुम्हारी

 



तेरी जुल्फों सा साया न मिला
तेरे जैसा हमसफ़र पराया न मिला
बिता देते हम भी कुछ वक्त तेरे इतर
खुद से हमें वक़्त इतना जाया न मिला.


ये जो ज़ख्म हैं, अपनों ने अता किये हैं
ज़रा पता करो हम क्या खता किये हैं
तुम बेपरवाह रहो, तुम मसरूफ रहो
इरादा नहीं बदलने वाला हम भी जता दिये हैं.


सज संवर कर आ रही हो अपनी छत पर
खिड़कियों के परदे भी हमने हटा दिए है
तुम्हारी दीद को फलक पर आया है चांद
खूबियां नहीं, तुम्हारी नादानियों को बता दिए हैं.


तुम्हें हमसे कैसा शिकवा था, कैसा गिला था
चंद बातें थी लम्हों में, कैसा वो सिलसिला था
अज़ीब शख्सियत थी तुम्हारी, तुम थी कहां की?
मुझे खुद का पता नहीं, मैं तुमसे कहा मिला था?





































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