सफ़र में रहते हैं, किसी के पीछे नहीं चलते
गिर भी जाएं तो रहनुमाई पर नहीं संभलते
घने अंधकार का साया नकाब ओढ़े हुए है
हौसले बड़े हों तो, जुगनुओं जैसे नहीं जलते
उम्मीदें हैं, इक आस भी जहन में कौंधती है
बादलों के इरादों से डरकर सूरज नहीं ढलते
हवाएं मंजिलों को छोड़कर रुख मोड़ लेती हैं
कोशिश जारी है, हम बैठकर हाथ नहीं मिलते
Nice poem ☺️
ReplyDeleteNice poem ☺️
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